कभी आतिश का नूर थे तुम, तो कभी इस दिल का सुकून थे तुम।
तुम मे कभी हमने फलक का मंजर सा देखा था ।
मगर अब वो कहीं गुमसुम सा हो गया
तुमसे एक रब्त सा था कभी, मगर अब सब सक्त सा हो गया
कभी तुम्हे शहकार समझ कर दुनिया में हाहाकार मचा देते थे
मगर अब वो कहीं गुमसुम सा हो गया
तुमसे एक रब्त सा था कभी, मगर अब सब सक्त सा हो गया
कभी तुम्हे शहकार समझ कर दुनिया में हाहाकार मचा देते थे

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