Thursday, May 30, 2019

Ek Waqt Tha

कभी आतिश का नूर थे तुम,  तो कभी इस दिल का सुकून थे तुम।
तुम मे कभी हमने फलक का मंजर सा देखा था ।
मगर अब वो कहीं गुमसुम सा हो गया
तुमसे एक रब्त सा था कभी, मगर अब सब सक्त सा हो गया
कभी तुम्हे शहकार समझ कर दुनिया में हाहाकार मचा देते थे
एक वक्त था,
जब हमे सिर्फ अफताब से मेहताब का
 इत़जार रहा करता था,
जब तुम्हारा वजूद, तुम्हारी मौजूदगी का एहसास दिलाया करता था
मकबूल से कब मेहबूब बन गये पता ही नहीं चला था
ओर हां !!
तुम्हारी चश्म की चमक आज भी भूले नहीं भूलती।

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